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मानस वृंदावन (दिन – ८) योग्य आश्रित ही गुरु की सच्ची संपदा है भारत का ऋषि किसी से संपति नहीं, संतति मांगता है

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वृंदावन की परम पावनी धरती पर पूज्य मोरारी बापू द्वारा तलगाजरडी प्रेमघाट से, पतीत पावनी कथा सरिता बह रही है। वक्ता और श्रोता सब कृष्ण भाव से परिप्लावित होकर गा रहे है- सभी के मन नर्तन कर रहे है, मन ही क्या? आत्मा – कृष्ण प्रेम में सराबोर हो कर नर्तक बन गइ है। ऐसी अद्भूत भावावस्था में आज आठवें दिन की कथा में बापू ने कहा कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा और कौन पुरुष है? यहाँ तो सब वृजांगना है। सब कृष्ण- प्रेमी है।
बापू ने कहा कि वह भागवत के गायक नहीं है, श्रोता है। पर ‘स्वान्त:सुखाय’ आपने गोपीगीत कथा का गान किया था। शिव गोपी बन कर ही रासलीला में जा पाये थे, इसलिए शिव गोपी है। ब्रह्मा भी गोपी है। हनुमानजी ने भी अहिरावण की कुलदेवी के मंदिर में मातृशरीर धारण किया था, वही गोपी है और बापूने कहा कि यहाँ वृंदावन में तुम्हारे मोरारीबापू भी गोपी है।
मातृ शरीर की महिमा है। हमारे नरसिंह महेताने तो गाया है कि
“संसार में सारभूत अवतार अबला का है।”
जिसमें मुनि का मौन और ऋषि की वाणी हो, वह गोपी है। शरीर और जाति को छोडो, चित्त स्त्रैण होना चाहिए! जो कृष्ण के चरण में समर्पित है, वह गोपी है। कृष्ण के नाम, रुप, लीला, धाम में जो पूर्णत: समर्पित हो, वह सब गोपी है। इन्द्रियों से जो कृष्ण को समर्पित हो जाय, वह गोपी है। नेत्र से कृष्ण दर्शन, जिह्वा से कृष्ण नाम, घ्राण से कृष्ण की सुगंध, कान से कृष्ण नाम का श्रवण, हाथ से कृष्ण काम और पैर से कृष्ण की तरफ गति-
ऐसे पुरा शरीर कृष्णमय हो, ऐसे सब गोपी है।
सच्चा कृष्ण प्रेमी मिलन के बजाय विरह को पसंद करेगा। मिलन में कृष्ण एक होता है, विरह में पुरा विश्व कृष्ण बन जाता है।
पूज्य बापू ने आज विरही के दस लक्षण बतायें। यह दसों अवस्था श्री उज्जवल नीलमणिकरजी ने चैतन्य महाप्रभुजी को देखकर बताई है। गौरांग इन सभी स्थितियों से गुजरे है।
पहली अवस्था है- चिंता। स्थूल प्रेम में भी प्रेमी की चिंता बनी रहती है, कृष्ण प्रेमी भी चिंतामें रहता है।
दूसरी-जागरण, भगवत् प्रेमी सो नहीं पाता। शंकराचार्यजी ने इस अवस्था को ‘सुषुप्त जागरण’ कहा है। बुद्ध पुरुष की निद्रा समाधि है। हमारा शरीर पंचभूत का है। पैर के नख से मल स्थान तक- पृथ्वी तत्व है। इस से उपर जल का स्थान है। नाभी अग्नि का स्थान है। नाभी से ह्रदय तक वायु का स्थान है। कंठ से उपर तक आकाश का स्थान है। नाक, कान, आंख, मुख मन का स्थान है। जब सो जाना हो, तब इन छहों स्थानो में अपने शरीर को विभाजित कर दो। तब अपने आप जो नींद आ जायेगी, वह समाधि है। कृष्ण जब स्वरुप से मन में, मन से मन से आकाश में, आकाश से वायु में, वायु से अग्नि में, अग्नि से जल में, जल से पृथ्वी में आता है, तब हम सोये हुए ही जाग जाते हैं। यह निद्रा समाधि है।
यह केवल योगी ही कर सकता है, ऐसा नहीं है। हम जैसे कृष्ण प्रेम के भोगी भी कर सकते है।
यह क्रमशः होता है। कृपा से-अगर किसी असंग हाथ स्पर्श कर दें, तो यह घटीत हो जाता है। प्रेम मारग की दूसरी अवस्था जागरण है। कृष्ण विरह में जो बार बार रोता रहता है, वह कभी सो नहीं पाता है-इसे जागरण कहते है। गौरांग किशोरावस्था में भी सो नहीं पाते थे। शुचि माता पूछती है, तब गौरांग कहते हैं कि हमें कृष्ण नाम का महा-रोग लगा है।
तीसरी अवस्था – उद्वेग, चौथी-कृशांगता, पांचवी – मालिन्य, (मुख मलीन हो जाता है।)
छठ्ठी- प्रलाप – प्रेम में लज्जा चली जाती है, भीतर से चीख नीकलती है।
सातवीं – शारीरिक व्याधि,
आठवीं- उन्माद, नवमीं -मूर्छा, बेहोशी, और दसवीं – मृत्यु- मृत्यु के पूर्व की आखिरी क्षण में जैसे जी रहे हो, ऐसी अवस्था विरही साधक की हो जाती है।
और तभी वह पल आती है, जब मीरां द्वारकाधीश में समा गई, चैतन्य महाप्रभुजी ठाकुरजी में समा गए और तुकाराम पंढरीनाथ में समा गए।
गोपीजन इन सभी अवस्था में से गुजरते है। या फिर यूं कहे, कि ऐसी स्थिति से गुजरने के लिए गोपीजन बनना पड़ता है!
कथा के क्रम में – विश्वामित्र ऋषि द्वारा दशरथजी से राम-लक्ष्मण की मांग का प्रसंग समजाते हुए कहा कि भारत का ऋषि संपति नहीं, संतति मांगते है। यज्ञ रक्षा, बाद में अहिल्या उद्धार कर के धनुष्य यज्ञ में जनकपुरी सुंदर भवन में निवास करते है। बापूने कहा कि योग्य आश्रित ही गुरु की संपदा है। जिस के पास साधन, साधना, शस्त्र, शास्त्र, सूत्र और मंत्र छहों जिस के पास हो, ऐसी व्यक्ति मिलना दूर्लभ है। पर विश्वामित्र के पास यह सभी छह चीज है। फिर भी उनका यज्ञ पूरा नहीं होता है। जब राम और लक्ष्मण आते है, तभी यज्ञ पुरा होता है। राम याने सत्य, लक्षमण याने समर्पण-हमारा यज्ञ तभी पुरा होता है, जब हमारे साथ सत्य होगा। सत्य आएगा उसके साथ समर्पण अपने आप आएगा- और तब घटना घटती है। सत्य को पकड लिया उस के पास सब आने लगता है।
अहिल्या उद्धार के संदर्भ में बापू ने कहा कि सुधारक और उद्धारक बहुत होते है। पर जरुरत है स्वीकारक की। जो जैसा हो,वैसा स्वीकार कर ले, वही सच्चा साधु है। साधु के मुख से निकले मंत्र से त्रिभुवन शुद्ध हो जाता है।
विश्वामित्र के साथ राम लक्ष्मण सुंदर सदन में ठहरते है, वहाँ तक कथा को ले जा कर बापूने अपनी वाणी को विराम दिया।

मनोज जोशी
महुवा – भावनगर

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