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मानस वृंदावन – दिन – ६-वृंदावन पृथ्वी का ह्रदय है, धड़कन है, स्पंदन है हाथ से छूटे वह त्याग, ह्रदय से छूटे वह वैराग्य

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वैजयंती धाम – वृंदावन में पूज्य मोरारी बापू की व्यासपीठ से प्रकाशित हो रही “मानस-वृंदावन” के आज छट्ठे दिन कथारंभे इस विस्तार की सांसद सुश्री हेमामालिनी ने व्यासपीठ की वंदना की। और सब को होली की बधाई दी। तत्पश्चात उत्तराखंड की राज्यपाल महोदयाजी की विशेष उपस्थिति रही। आपने भी व्यासपीठ की वंदना के साथ अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। पूज्य बापू ने कहा कि कथा के केन्द्र में गौरांग महाप्रभुजी है। चैतन्य महाप्रभुजी ने विश्व को हरि नाम दिया, और हरि पर प्रेम रखने का संदेश दिया।
मानस में लिखा है-
धरम ते बिरती योग ते ज्ञाना। ज्ञान मोक्ष प्रद बेद बखाना।।
महाप्रभुजी ज्ञानी तो थे ही, पर सन्यास ले कर वेरागी बन गये।
जो हाथ से छूटे वह त्याग है और ह्रदय से छूटे वह वैराग्य हैं।
मानस और वृंदावन की साम्यता के संदर्भ में पूज्य बापू ने कहा कि रामजी वन गमन करते समय अपनी जटा बांधते है। तब सुमन्तजी रोते है। गौरांग महाप्रभु के सन्यासी बनते समय आपके सुशोभित घूंघराले बाल नीकलवा कर क्षौर कर्म करवाते समय नाई रो रहा है।पर चैतन्य महाप्रभु सही अर्थ में वेरागी है। वृंदावन में जो तेज है ऐसा तेज और तीर्थ से ज्यादा दिखता है। क्यूँ कि यहाँ कृष्ण प्रकट हुए थे। और कृष्ण चैतन्य ने नाम संकीर्तन से इस तीर्थ की महिमा बढाई है। वृंदावन पृथ्वी का ह्रदय है, धड़कन है, स्पंदन है।
बापू ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण का साक्षात विग्रह- हमें नाम दान देने के लिए, चैतन्य महाप्रभु के रुप में प्रकट हुआ था। महाप्रभु केवल त्यागी नहीं, वैरागी थे। परमात्मा कहते है कि जिससे मैं द्रवीभूत हो जाता हूँ, वह भक्ति है। भक्ति में भाव तो है ही, रस होना चाहिए। व्यासपीठ के पास औपचारिकता नहीं, अनुभूतियाँ होती है।
बुद्ध पुरुष कभी सत्ता के वश में नहीं होता और सत के वश में भी नहीं होते। बुद्ध पुरुष सूत से और सूत्र से मुक्त हो जाते हैं। बोध से आनंद प्रकट होता है। आनंद से शांति मिलती है। और शांति के बाद प्रेम प्रकट होता है। हमारा आखिरी लक्ष्य प्रेम है। जहाँ वृंद है, वहाँ वृंदावन है।
मानस और वृंदावन की समानता दिखाते हुए हुए बापू ने कहा कि बाल कांड में बाल राम के दर्शन के लिए स्त्री-पुरुषों का वृंद है इस लिए बाल कांड वृंदावन है। अयोध्या कांड में अवध की प्रजा के वृंद के वृंद राम वनवास के समय साथ साथ नीकल पडते है। इसलिए अयोध्या कांड वृंदावन है। अरण्य कांड में वनवासी और ऋषियों का वृंद है,इसलिये अरण्य कांड वृंदावन है। किष्किंधा कांड में सख्य भाव है-कृष्ण की जीवन यात्रा में गोप बाल, सुदामा, अर्जुन, उद्धव आदि से सख्य दिखता है। मानस में भी राम ने सुग्रीव से सख्य रखा है। इसलिए किष्किंधाकांड भी वृंदावन है। सुंदर कांड में विभूषण के घर तुलसीका वृंद है इसलिए सुंदरकांड वृंदावन है। लंका कांड में असुरों और वानरों का झुंड है इसलिए लंका कांड वृंदावन है। और उत्तर कांड में राजा राम के साथ स्वजन और नगर जनों का वृंद है। इसलिए उत्तर कांड भी वृंदावन है। आखिर में नाम ही सार है।
बापू ने कहा कि अगर हाथ में माला है, तो हाथ वृंदावन है। उंगलियों से माला फेरते है तो उंगलियां वृंदावन है। कंठ में तुलसी माला हो, तो कंठ वृंदावन है। ह्रदय में राम नाम है, तो ह्रदय वृंदावन है। आंख मुरलीधर के दर्शन में रोयें तो आंख वृंदावन हो जाती है। आखिरी आदमी को मदद करें – सेवा करें, उस के रोम रोम में वृंदावन है। वृंदावन केवल भूमि नहीं है, साधक की भूमिका है।
भगवान शंकर मानस कथा के प्रथम वक्ता है। शंकर के मस्तिष्क पर जटा है। हम गृहस्थी के माथे पर चिंता रुपी-आधि, व्याधि, उपाधि की जटा है। राम कथा के गान से जटा से चिंता नहीं, गंगा बहती है।शंकर के नेत्र विशाल है, मतलब- वक्ता का द्रष्टिकोण विशाल होना चाहिए। शंकर ने विष पान किया है,कंठ में विष होते हुए भी वाणी से राम कथा का अमृत बहाते है। विषम परिस्थिति ही विष है। इसे पी जाना विष पान है। बदनामी और नींदा का विष पी कर भी विश्व को अमृत देना। मस्तक पर दूज का चांद है – जो संकेत देता हे कि हम पूर्ण नहीं है। हमें अभी आगे बढना है-चौदहवीं तक। अगर पूर्ण हो गए तो राहु से ग्रसित होने का डर रहता है।
पूज्य बापू ने कथा के क्रम में प्रवेश करते हुए राम जन्म की कथा का सात्विक, तात्विक, वास्तविक गान करते हुए, आज वृंदावन में राम जन्म तक कथा को ले जा कर, आनंद विभोर वातावरण में अपनी वाणी को विराम दिया।
मनोज जोशी
महुवा – भावनगर

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