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विविध कर्म अशांतिप्रद है और विविध मत शोकप्रद है।

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गंगा तट पर हरिहर आश्रम के तत्वावधान में आयोजित “मानस हरिद्वार” कथा के आज छठे दिन, पूज्य बापू ने आरंभ में एक जिज्ञासा के समाधान में कहा कि
“सुख-दु:ख, स्वीकार-अस्वीकार, रात- दिन, जड़-चेतन जीव-शिव, पाप- पुण्य, आना- जाना… यह सब सापेक्ष है- एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे ही खल और भल भी सापेक्ष होता है।कौन खल और कौन भल? इसकी पहचान के लिए हमें मार्गदर्शक की जरूरत पड़ती है। ऐसे मार्गदर्शक को हम गुरु कहते हैं।
शंकर मत अनुसार ज्ञान द्वैत को खत्म करता है और एकत्व तरफ ले जाता है। साधु ज्ञानी हो ना हो, विवेकी अवश्य होता है।तुलसीदासजी साधु को हंस कहते हैं, जो अच्छे-बुरे का भेद स्पष्ट कर देता है। ऐसे विवेकी बुद्ध पुरुष की हमें आवश्यकता रहती है। हर एक काल में कंस भी होता है, कृष्ण भी होता है। राम होता हैं, रावण भी होता है। प्रहलाद होता है और हिरण्यकशिपु भी होता है। हमें ऐसे व्यक्ति की तलाश रहती है, जो हमें इन दोनों की पहचान करवाएं।
कथा में वक्ता बहुत सारी बातें कहता हैं, लेकिन उसमें से क्या ग्रहण करना और क्या छोड़ देना – यह श्रोता के विवेक पर निर्भर करता है। सत्संग के बिना विवेक नहीं होता, और राम कृपा के बिना सत्संग नहीं मिलता।अब प्रश्न यह होगा कि कृपा कैसे उतरें? तुलसीदास जी इसका जवाब देते हैं – “मन क्रम वचन छांडी चतुराई….” जब हम चतुराई छोड़ दें, तभी कृपा उतरती है।
बापू ने कहा कि परमात्माने जड़-चेतन, गुण-दोष मय यह विश्व बनाया है। जिसमें संत, हंस की तरह होता है- जो गुण ग्रहण कर लेता है। प्रकाश और अंधेरा हर युग में रहता है।अगर अंधकार नहीं है, तो प्रकाश की महत्ता कैसे पहचानोगे? प्रकाश की ओर जाने के लिए भी अंधेरे की जरूरत होती है। इसलिए प्रकाश और अंधकार दोनों, सदैव साथ साथ चलते हैं।
अन्य जिज्ञासा के संदर्भ में बापू ने कहा कि तुलसीदासजी ने तीन प्रकार के जीव बताए हैं – विषयी, साधक और सिद्ध। जीव कर्म किए बिना क्षण भर भी रह नहीं सकता। तीनों प्रकार के जीव कर्म की जाल बुनते रहते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं की विध विध कर्म भी अधर्म है। उपनिषद कहता है कि विविध प्रकार के कर्म से कभी शांति नहीं मिलेगी। और अशांति ही अधर्म है। हमारे जैसे सभी जीव, कर्म में जुड़े हुए रहते हैं, और कर्म से जीव को शांति नहीं मिलती।
जैसे विध विध कर्म है, ऐसे ही विध विध मत भी है। जैसे विविध कर्म अधर्म है, ऐसे ही विध विध मत शोकप्रद है।बापू ने कहा कि काल के परिप्रेक्ष्य में कुछ बातें सनातन होती है, जिसे बदला नहीं जा सकता। हम अनेक कर्म और अनेक मत से बद्ध है।इससे हम अशांति और शोक में जीते हैं। तुलसीदासजी विश्वास और विनम्रता से कहते हैं कि इस जाल में से निकलने के लिए रामपद में अनुराग करें। तुलसीदासजी कहते हैं कि मैं ने रामपद पर अनुराग किया, इसका अनुभव करके मैं आपको यह सीख देता हूं।बापू ने कहा कि तुम्हारा बुद्ध पुरुष जो मार्ग दिखाएं, उस पर अनुगमन करना।
बापू ने कहा कि “विषयी को शिक्षा देना, साधक को दीक्षा देना, और सिद्ध को भिक्षा देना। विषयी को कभी दीक्षा मत देना, और साधक को कभी शिक्षा मत देना।
बापू ने कहा कि दया सामूहिक होती है। पर कृपा पात्र को ही मिलती है। कृपा सार्वजनिक नहीं हो सकती।
मानस की बानी मृदु भी है और गूढ भी है। ऐसी मृदु बानी ही श्रोता की बुद्धि के द्वार खोल देती हैं।
बापू ने कहा कि आपकी दृष्टि में विषयी, साधक और सिद्ध के उपरांत जीव का चौथा एक प्रकार है- शुद्ध। इस चौथे प्रकार के जीव को प्रसाद चाहिए – सद्गुरु का कृपा प्रसाद। और यदि आपने प्रसाद पाया है, तो आप बांटे बिना रह नहीं सकोगे! बांटना ही पड़ेगा! मैं भी तो मेरे त्रिभुवन दादा के प्रसाद को बांटता फिरता हूं।
द्वार की चर्चा करते हुए पूज्य बापू ने कहा कि काम नर्क का द्वार है।धर्म वैराग्य का द्वार है।और धर्म का फल दु:ख है।अपनी नहीं बल्कि औरों की पीड़ा देखकर दुख होता है।अर्थ के दो द्वार है – प्रारब्ध और पुरुषार्थ। मोक्ष का द्वार देह है।
बापू ने कहा कि पाप कर्म दुर्गति देता है, पुण्य कर्म स्वर्ग देता है। तीसरा है आत्म कर्म, जो उजाला प्रकट करता है। चौथा है – झूठा कर्म, जो अंधेरे के सिवा और कुछ नहीं दे सकता।और साधु कर्म- ब्रह्म कर्म, शांति देता है। उपाधि नहीं, समाधि देता है। हमारे बुद्ध पुरुष के मृदु और गुढ वचन सुनने से हमारे बंद द्वार खुल जाते हैं।
बापू ने कहा कि जो कामी होगा, वह सदा गाएगा। कामी गाए बिना नहीं रह सकता।और क्रोधी कभी गा नहीं सकता। लोभी को गाना आता हो, फिर भी वह गाएगा नहीं। परशुरामजी के संदर्भ में पूज्य बापू ने कहा कि भगवान राम की मृदु और गुढ वाणी सुनकर, क्रोध से भरे परशुरामजी भी गाने लगते हैं।
कथा के क्रम में पूज्य बापू ने चारों भाइयों के नामकरण के बाद गुरुसे शिक्षा पाना और विश्वामित्र ऋषि द्वारा राम-लक्ष्मण को साथ में लेकर यज्ञ रक्षा के लिए निकलना।असुरों के वध के बाद, यज्ञ रक्षा करके आगे जाकर अनसूया का उद्धार, और जनकपुरी में धनुषयज्ञ के बाद परशुरामजी की विदाई, चारों भाइयों के लग्न, बाद में कन्या विदाई का अश्रुपूर्सण वर्णन,
सबका अयोध्या में वापस लौटना और विश्वामित्र ऋषि की विदाय के साथ बालकांड का समापन करते हुए, पूज्य बापू ने आज की कथा में अपनी वाणी को विराम दिया।

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